असम विधानसभा चुनाव से ठीक पहले, ‘Miya Muslim’ के मुद्दे ने राज्य की राजनीति में काफी तनाव पैदा कर दिया है। 27 जनवरी को तिनसुकिया में दिए गए एक भाषण में, असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने कथित तौर पर ‘मियां मुसलमानों’ के खिलाफ सख्त टिप्पणी की है। इस बयान से राजनीतिक पार्टियों, सिविल सोसाइटी और सोशल मीडिया पर गरमागरम बहस छिड़ गई है।
भाषण के सार के बारे में, विपक्ष का दावा है कि मुख्यमंत्री ने ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया है जिससे एक खास समुदाय के खिलाफ नफरत फैल सकती है। समर्थकों का जवाबी तर्क यह है कि राज्य में अवैध इमिग्रेशन एक असली समस्या है, और इसे प्रशासनिक सख्ती के बिना हल नहीं किया जा सकता है। इन दोनों बातों के बीच तनाव असम की चुनाव से पहले की राजनीति को और बांट रहा है।
‘मियां मुसलमान’ शब्द का संदर्भ
हालांकि ‘मियां’ शब्द कई जगहों पर बंगाली बोलने वाले मुसलमानों के लिए एक सम्मानसूचक शब्द है, लेकिन असम की राजनीतिक बातचीत में इसे अक्सर अवैध बांग्लादेशी इमिग्रेशन के आरोपों से जोड़ा जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, भाषा और पहचान पर आधारित संघर्ष के बीज ब्रिटिश काल से ही असम में बोए गए थे। 19वीं सदी के बीच में सरकारी काम में असमिया भाषा की मांग, और बाद में बंगाली-असमिया तनाव—इन सभी ने धीरे-धीरे पहचान के सवाल को राजनीति के केंद्र में ला दिया है। हाल के दशकों में, धार्मिक पहचान पर बहस भी इसमें जुड़ गई है।
मुख्यमंत्री का तर्क और कानूनी संदर्भ
मुख्यमंत्री शर्मा ने दावा किया है कि अवैध इमिग्रेशन पर उनकी स्थिति सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के अनुरूप है। उन्होंने सोशल मीडिया पर कोर्ट की कुछ टिप्पणियों का हवाला दिया और कहा कि असम के कुछ जिलों में डेमोग्राफिक बदलाव खतरनाक स्तर पर पहुंच गए हैं। उनके अनुसार, राज्य की “पहचान की रक्षा” के लिए अगले कुछ दशकों तक सख्त नीतियों की ज़रूरत है।
इस बीच, उन्होंने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रोसेस के तहत वोटर लिस्ट के वेरिफिकेशन का ज़िक्र किया है, यह दावा करते हुए कि इससे 4-5 लाख संदिग्ध वोटरों के नाम बाहर हो सकते हैं। इसके अलावा, BJP कार्यकर्ताओं से वोटर लिस्ट पर आपत्ति जताने के लिए फॉर्म-7 जमा करने का आग्रह किया गया है।

विपक्ष की प्रतिक्रिया
कांग्रेस ने मुख्यमंत्री की टिप्पणी का कड़ा विरोध किया है। पार्टी के एक हिस्से ने कोर्ट जाने की धमकी दी है, उनका दावा है कि यह बयान हेट स्पीच है और सामाजिक शांति के लिए खतरनाक है। कई कांग्रेस नेताओं ने चेतावनी दी है कि ऐसी भाषा से राज्य में अस्थिरता बढ़ सकती है।
दूसरी ओर, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के चीफ बदरुद्दीन अजमल ने लोगों से BJP को वोट न देने की अपील की है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम कम्युनिटी पहले से ज़्यादा सुरक्षित है और डेवलपमेंट के नाम पर नफरत फैलाना मंज़ूर नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि गुवाहाटी जैसे शहरों में लेबर और सर्विस सेक्टर में माइनॉरिटीज़ के रोल को नकारना अनरियलिस्टिक है।
सोशल मीडिया और पब्लिक ओपिनियन
इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर राय बहुत बंटी हुई है। यूज़र्स का एक ग्रुप चीफ मिनिस्टर की बात का सपोर्ट करता है और कहता है कि बॉर्डर सिक्योरिटी और एडमिनिस्ट्रेटिव एफिशिएंसी के लिए गैर-कानूनी घुसपैठ को रोकना चाहिए। यूज़र्स का एक और ग्रुप शिकायत करता है कि चुनाव से पहले वोट बैंक पॉलिटिक्स के लिए जानबूझकर हेट भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है।
चुनाव का इक्वेशन
इस साल मार्च-अप्रैल में असम की 126 सीटों पर असेंबली इलेक्शन होने हैं। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों के बीच लड़ाई में ‘पहचान’, ‘भाषा’ और ‘माइग्रेशन’ तीन मुख्य मुद्दे बनकर उभरे हैं। जानकारों के मुताबिक, वोटर लिस्ट में बदलाव और बयानबाजी की राजनीति के साथ चुनावी कैंपेन और ज़्यादा बंटा हुआ होने की संभावना है।
आगे क्या है?
कानूनी चुनौतियों, एडमिनिस्ट्रेटिव कार्रवाई और राजनीतिक कैंपेन के ज़रिए असम की बहस किस दिशा में जाएगी, यह आने वाले हफ़्तों में साफ़ हो जाएगा। लेकिन एक बात पक्की है: ‘मियां मुस्लिम’ मुद्दा सिर्फ़ एक शब्द नहीं है; इसने असम के इतिहास, पहचान और भविष्य की राजनीति पर एक गहरे टकराव को सामने ला दिया है।