BMC चुनाव ‘करो या मरो’ की लड़ाई क्यों है? उद्धव-राज ठाकरे एक क्यों हुए?

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BMC चुनाव

महाराष्ट्र की पॉलिटिक्स में फिर से बड़ा हंगामा है। हाल ही में हुए लोकल बॉडी इलेक्शन में बुरी हार के बाद, अपोज़िशन पॉलिटिक्स लगभग हार गई थी। इसी सिलसिले में आने वाले बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (BMC) इलेक्शन को लेकर एक नया इक्वेशन बना है। उद्धव ठाकरे की लीडरशिप वाली शिवसेना (UBT) और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) ने BMC इलेक्शन एक साथ लड़ने का फ़ैसला किया है। दोनों ठाकरे भाइयों ने मुंबई में एक जॉइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस अलायंस का ऑफिशियल अनाउंसमेंट किया।

यह अलायंस न सिर्फ़ पॉलिटिकल बल्कि पैशन, लेगेसी और सर्वाइवल की लड़ाई का सिंबल बन गया है। क्योंकि, BMC इलेक्शन ठाकरे परिवार के लिए सिर्फ़ एक म्युनिसिपल इलेक्शन नहीं है—यह भविष्य की पॉलिटिक्स में सर्वाइवल का सवाल है।

असेंबली इलेक्शन में एक झटका और सुलह का रास्ता

हाल ही में हुए महाराष्ट्र असेंबली इलेक्शन के रिज़ल्ट ने शिवसेना (UBT) को बहुत कमज़ोर कर दिया है। शिवसेना, जो कभी महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री तय करती थी, अब सिर्फ़ 20 सीटों पर आ गई है। दूसरी ओर, राज ठाकरे की MNS एक भी सीट नहीं जीत पाई। इस नतीजे से यह साफ़ है कि ठाकरे खेमे का भविष्य धीरे-धीरे अलग-अलग लड़ाइयों में सिमटता जा रहा है।

इस हार के बाद, राजनीतिक गलियारों में ठाकरे परिवार के फिर से एक होने की अटकलें लगने लगीं। 27 जून को दोनों भाइयों की एक साथ रैली करने की घोषणा से अटकलों को और बल मिला। फिर 5 जुलाई, 2025 को, लगभग दो दशक बाद, राज और उद्धव ठाकरे एक ही मंच पर दिखे। गणेश चतुर्थी और दिवाली पर एक साथ दिखकर उन्होंने यह साफ़ संदेश दिया कि यह एकता सिर्फ़ सांकेतिक नहीं है।

BMC इतनी मज़बूत क्यों है?

BMC चुनावों को लेकर इस गहरी दिलचस्पी का मुख्य कारण इसकी बहुत ज़्यादा ताकत और आर्थिक मज़बूती है।

कुल सीटें: 227

बजट (2024): लगभग ₹74,000 करोड़

क्षेत्र: 3 ज़िले, 27 विधानसभा क्षेत्र, 6 लोकसभा क्षेत्र

एशिया की सबसे अमीर नगर निगम कही जाने वाली BMC का बजट कई राज्यों के बजट के बराबर या उससे भी ज़्यादा है। इससे उसे मुंबई के डेवलपमेंट, इंफ्रास्ट्रक्चर, हेल्थ, एजुकेशन और अर्बन प्लानिंग पर सीधा कंट्रोल मिल जाता है। पॉलिटिकल सर्कल में, BMC को कंट्रोल करने वाली पार्टी को मुंबई के पावरफुल बिल्डर्स और कॉर्पोरेट लॉबी का सपोर्ट माना जाता है, जो लंबे समय में राज्य की पॉलिटिक्स में अहम रोल निभाते हैं।

उद्धव-राज ठाकरे एक क्यों हो गए?
उद्धव-राज ठाकरे एक क्यों हो गए?

अगर ठाकरे परिवार हार गया तो उसे क्या नुकसान होगा?

BMC शिवसेना का ऐतिहासिक गढ़ रहा है। लंबे समय से पार्टी ने इस म्युनिसिपल बॉडी के ज़रिए अपनी ऑर्गेनाइज़ेशनल ताकत बनाए रखी है। राज ठाकरे ने खुद BMC-सेंट्रिक पॉलिटिक्स के ज़रिए MNS को चलाया है।

अगर शिवसेना (UBT) असेंबली इलेक्शन की तरह BMC इलेक्शन भी हार जाती है, तो पॉलिटिकल एनालिस्ट्स के मुताबिक—

ठाकरे परिवार का पॉलिटिकल असर लगभग खत्म हो जाएगा

शिवसेना की परंपरा और ऑर्गेनाइज़ेशन खत्म हो जाएगा

ठाकरे परिवार महाराष्ट्र की पॉलिटिक्स में पूरी तरह से किनारे हो जाएगा

यही वजह है कि उद्धव और राज ठाकरे BMC इलेक्शन को अपना पॉलिटिकल वजूद बचाने के आखिरी मौके के तौर पर देख रहे हैं।

सत्ताधारी खेमे का पलटवार

इस बीच, शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत BMC जीत को लेकर आश्वस्त हैं, लेकिन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कड़े शब्दों में पलटवार किया है। उनका दावा है कि शिवसेना बंटी हुई है और लोग “असली” और “नकली” का फर्क पहले ही समझ चुके हैं।

शिंदे खेमे के मुताबिक, हाल के नगर निगम और स्थानीय निकाय चुनावों में 75 से 80 प्रतिशत सफलता महायुति के पक्ष में है, जो उनकी मजबूत स्थिति को साफ करता है। सत्ताधारी गठबंधन का दावा है कि वे विचारधारा और विकास की राजनीति में विश्वास करते हैं, जबकि विपक्ष सिर्फ सत्ता के लिए गठबंधन कर रहा है।

कांग्रेस और विपक्षी एकता पर सवाल

इस स्थिति में कांग्रेस की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि विपक्षी एकता की बात हो रही है, लेकिन असल में कई जगहों पर बंटवारा है। उद्धव-राज गठबंधन जहां एक तरफ विपक्षी राजनीति को नई ताकत दे रहा है, वहीं यह BJP और महायुति के लिए समीकरण को थोड़ा मुश्किल भी बना रहा है।

नतीजा

BMC चुनाव सिर्फ एक नगर निगम चुनाव नहीं है। यह है—

ठाकरे परिवार के राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई

मुंबई में सत्ता और आर्थिक नियंत्रण का सवाल

और महाराष्ट्र की राजनीति की भविष्य की दिशा

इस लड़ाई में जीत या हार न केवल मुंबई, बल्कि पूरे राज्य का राजनीतिक नक्शा बदल सकती है।

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