Bangladesh political crisis 2026: Tarique Rahman’ की वापसी, यूनुस विवाद और अल्पसंख्यकों की चुप्पी

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Bangladesh political crisis Tarique Rahman

Bangladesh एक बार फिर गहरे पॉलिटिकल संकट में फंस गया है। पॉलिटिकल हिंसा, हत्याएं, माइनॉरिटी पर ज़ुल्म और आने वाले आम चुनाव, ये सब देश के हालात को और अस्थिर बना रहे हैं। इस अशांत माहौल में, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के एक असरदार नेता तारिक रहमान 17 साल बाद देश लौट आए हैं। उनकी वापसी जहां पॉलिटिकल ताकत का इशारा करती है, वहीं उनकी चुप्पी और पिछली भूमिका नई बहस को भी जन्म दे रही है।

तारिक रहमान की 17 साल बाद देश वापसी: ताकत दिखाना या चुनावी रणनीति?

BNP के एक्टिंग चेयरमैन और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा ज़िया के बेटे तारिक रहमान लंदन में लंबे समय तक रहने के बाद देश लौट आए। ढाका में उनके स्वागत के लिए एक लाख से ज़्यादा समर्थक जमा हुए। यह भारी भीड़ साफ इशारा करती है कि अवामी लीग पर बैन लगने के बाद BNP अब बांग्लादेश की सबसे ताकतवर पॉलिटिकल पार्टी बनकर उभरी है।

पॉलिटिकल गलियारों में चर्चा है कि अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस भी इस भीड़ को देखकर हैरान थे। कई लोगों के मुताबिक, यह 12 फरवरी को होने वाले आम चुनावों से पहले BNP का एक सोचा-समझा ताकत दिखाने का तरीका था।

उस्मान हादी मर्डर और तारिक रहमान का पॉलिटिकल बयान

हाल ही में, पॉलिटिकल एक्टिविस्ट उस्मान हादी की हत्या ने बांग्लादेश में बहुत हंगामा मचा दिया। तारिक रहमान ने इस घटना पर एक इमोशनल स्पीच दी। उन्होंने हादी की मौत को “शहादत” बताया और पॉलिटिकल हिंसा की निंदा की। उनके भाषण में 1971 और 2024 के शहीदों, युवा लीडरशिप और “नया बांग्लादेश” बनाने की बात कही गई।

लेकिन सवाल उठता है – क्या यह दुख का इज़हार सिर्फ़ इंसानियत के नाते है, या चुनावी पॉलिटिक्स का हिस्सा है? क्योंकि भले ही BNP इस हत्या के बाद भी पॉलिटिकल रूप से एक्टिव रही है, लेकिन तारिक रहमान दूसरे ज़रूरी मुद्दों पर चुप रहे हैं।

हिंदू ज़ुल्म के मुद्दे पर चुप्पी: बड़े सवालों के सामने BNP

बांग्लादेश में माइनॉरिटी हिंदुओं पर हमले और हत्याएं कोई नई बात नहीं हैं। हाल ही में, हिंदू युवक दीपू दास की हत्या भी पूरे देश में चर्चा में रही। लेकिन इस घटना पर तारिक रहमान या BNP के टॉप लीडरशिप की तरफ से कोई साफ जवाब नहीं आया है।

पॉलिटिकल एनालिस्ट के मुताबिक, इस चुप्पी के पीछे BNP का इस्लामिस्ट वोट बैंक काम कर रहा है। क्रिटिक्स का दावा है कि उस्मान हादी की मौत में उसकी आवाज़ थी, लेकिन हिंदू हत्याओं पर उसकी चुप्पी BNP के डबल स्टैंडर्ड को दिखाती है। इससे माइनॉरिटी कम्युनिटी में डर और अनिश्चितता और बढ़ गई है।

तारिक रहमान की राजनीति में वापसी
तारिक रहमान की राजनीति में वापसी

तारिक रहमान का अतीत: ढाका ग्रेनेड अटैक का साया

तारिक रहमान का पॉलिटिकल सफर हमेशा कॉन्ट्रोवर्सी से घिरा रहा है। 2004 के ढाका ग्रेनेड अटैक में उन पर गंभीर आरोप लगे थे। उस हमले का टारगेट उस समय की अपोज़िशन लीडर शेख हसीना थीं। हमले में कई लोग मारे गए थे और बाद में ढाका कोर्ट ने तारिक रहमान को उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी।

हालांकि BNP इस फैसले को पॉलिटिकल बदला बताती है, लेकिन इस अतीत ने अभी भी उसकी इमेज पर शक पैदा किया है। 17 साल बाद देश लौटने के बाद भी, इस बात पर शक बना हुआ है कि उनका पॉलिटिकल एजेंडा कितना बदला है।

बांग्लादेश संकट का भारत पर असर: घुसपैठ और कड़े कदम

बांग्लादेश में राजनीतिक अशांति का असर भारत के अलग-अलग राज्यों में भी महसूस किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश, असम, गुजरात, दिल्ली और महाराष्ट्र में गैर-कानूनी बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे पर सख्त ऑपरेशन चल रहे हैं। गिरफ्तारियां, निकालना और कुछ मामलों में बुलडोजर ऑपरेशन भी किए गए हैं।

बांग्लादेश के हालात की झलक भारत के राजनीतिक और धार्मिक नेताओं के बयानों में साफ दिखती है। कई लोग दावा कर रहे हैं कि बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ जो हो रहा है, उसका असर भारत के सामाजिक और राजनीतिक माहौल पर भी पड़ सकता है।

बांग्लादेश चुनाव 2026: स्थिरता या नई अशांति?

12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव बांग्लादेश का भविष्य तय करने में बहुत अहम हैं। आवामी लीग पर बैन लगने के बाद BNP की जीत लगभग पक्की मानी जा रही है। लेकिन सवाल यह है कि – क्या यह जीत देश को स्थिर करेगी या फिर से हिंसा और बंटवारा बढ़ाएगी?

तारिक रहमान की वापसी बेशक एक बड़ी राजनीतिक घटना है। लेकिन माइनॉरिटी सिक्योरिटी, पॉलिटिकल हिंसा और अतीत के विवादित चैप्टर्स को नज़रअंदाज़ करके एक टिकाऊ डेमोक्रेसी बनाना मुमकिन नहीं है।

नतीजा

बांग्लादेश आज एक चौराहे पर खड़ा है। सत्ता बदल सकती है, लेकिन अगर पॉलिटिक्स में हिंसा, धार्मिक चुप्पी और पाखंड बना रहा, तो संकट बना रहेगा। तारिक रहमान के पास इतिहास बदलने का मौका है—लेकिन उन्हें एक बोल्ड स्टैंड की ज़रूरत है, खासकर माइनॉरिटी हिंदुओं की सिक्योरिटी और इंसाफ के मुद्दे पर। नहीं तो, “नया बांग्लादेश” सिर्फ़ एक नारा बनकर रह जाएगा।

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